Monday, September 13, 2010

कविता

वक्त का मरहम 
सावन की तरह
आयी घनघोर घटायें
सदमों की बरसात लिये
तकलीफ?
बहुत तकलीफ हुयी
इस बाढ मे बह गये
दिल मे करीने से संजोये
कुछ सपनों के चिथडे
रखे थी संभाल कर
इस आस मे कि शायद
लगा सकूँ उन पर कुछ पैबन्द
फिर से जी उठी थी
भूल गयी थी कि सावन
तो फिर आयेगा
मगर इस बाढ मे
वो चिथडे भी बह गये
रह गयी बस यादें
ज्येष्ठ आषाढ की धूप मे
सिकुडी मिट्टी की परत जैसी
हाँ तकलीफ हो रही है
हर बार होती है
हर बाढ पर होती है
बहुत तकलीफ
शायद वकत का मरहम
जानता ही इसका ईलाज।

4 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

जो जख्म देता है ऊपर वाला, उसका मरहम गर न बनाया होता तो उसने ये जख्म भी न बनाया होता. बस वक्त की परतें चढ़ने दीजिये कुछ तो दर्द कम होगा फिर वही एक संबल होगा.

vaishali said...

hello aunty. very well written. I think we relive our past and all the bad memories keep on haunting us. They cannot go and are a an integeral part of self

रानीविशाल said...

इस बाढ मे बह गये
दिल मे करीने से संजोये
कुछ सपनों के चिथडे
रखे थी संभाल कर
इस आस मे कि शायद
लगा सकूँ उन पर कुछ पैबन्द
फिर से जी उठी थी
भूल गयी थी कि सावन
तो फिर आयेगा
मगर इस बाढ मे
वो चिथडे भी बह गये
रह गयी बस यादें
bade se bada ghav samy ke sath hi bharata hai....aise dard ka aur koi marham nahi

अश्विनी कुमार रॉय said...

What can not be cured must be endured. It is rightly said that time is a great healer. However no words of solace can heal the wounds inflicted by the cruel time itself...