Wednesday, February 23, 2011

गज़ल --gazal

गज़ल
उसकी अर्थी को उठा कर रो दिये थे
रस्म दुनिया की निभा कर रो दिये थे

नाज़ से पाला जिसे माँ बाप ने था
 आग पर उसको लिटा कर रो दियेथे

थी उम्र शहनाइयाँ बजती मगर अब
मौत का मातम मना कर रो दिये थे

दी सलामी आखिरी नम आँखों से जब
दिल के ट्कडे को विदा कर रो दियेथे

यूँ सभी अरमान दिल मे रह गये थे
राख सपनो की उठा कर रो दिये थे

थी बडी चाहत कभी घर आयेगा वो
लाश जब आयी सजा कर रो दिये थे

था चिरागे दिल मगर मजबूर थे सब
अस्थियाँ गंगा बहा कर रो दिये थे

वो सहारा ले गया जब छीन हम से
सिर दिवारों से सटा कर रो दिये थे

रोक लें आँसू मगर रुकते नही अब
दर्द का दरिया बहा कर रो दिये थे

माँ ग ली उसने रिहाई क्यों  खुदा से
कुछ गिले शिकवे सुना कर रो दिये थे

6 comments:

दीप said...

अनूप जी वाकई दर्द डूबा दिया आप ने
मेरा धन्यवाद स्वीकार करें

Lalit Suri said...

मम्मी आप नै इस कविता सै वोह सारे लम्हे याद दिला दिये !!
इस ब्लोग कै दो मक्सद है :
1. हुम याद रखे उसे हमेशा हमेशा के लिये !
2. और हुम उस्के जीवन को अदर्श बनाये !

वोह याद बहुत आता है पर उस्का अह्सास अभी भी मेरे साथ है !!
शुक्रिया मम्मी जी !!

शिक्षामित्र said...

जिस पर गुजरती है,वही जानता है।

veerubhai said...

"maang lee usne rihaai kyon khudaa se ,
kuchh gile shikve sunaakar ro diye the ."
"asthiyaan gangaa bhaa kar ro diye the ......"behtreen maarmik bimb apno se rukhsat hone kaa ....
veerubhai .

Richa P Madhwani said...

http://shayaridays.blogspot.com

सुशील कुमार जोशी said...

अपने हिस्से की जिंदगी
लेकर आते हैं हम यहाँ
किसी को होता नहीं पता
जाना भी है कब और कहाँ ?