Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Thursday, November 4, 2010

तुझे ढूँढते रहे

( कविता )

तुझे ढूँढाते रहे
तेरे साथ दिवाली थी घर आँगन क्या
मेरे दिल के दिये भी जलते रहे
तेरे बाद दिवाली पे किसी कोने में
इक छोटी सी किरण को तरसते रहे

तू मेरे घर का चिराग था
तेरे दम से था ये घर रोशन्
तेरे बाद जरा सी खुशी के लिये
दूसरों का मुँह तकते रहे

तेरे देश मे दिवाली पे
यूँ दिये जलते नहीं क्या
हम उठा के मुँह सारी रात
आसमाँ मे तेरा घर ढूँढते रहे

ऎ खुदा इक माँ पे तो रहम खाया करो
उसके चिराग को दिवाली पे तो जलाया करो
इसी इन्तज़ार मे अंधेरी ज़िन्दगी के
सहकते से पहर कटते रहें
अनूप और शशी तुम बहुत याद आते हो। घर की दीवरें तुम्हारी राह देख रही हैं। अब कौन इस पर दीये जलायेगा? फिर भी यही दुआ है कि तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिले। हम जी रहे हैं जी लेंगे बस।

Monday, September 13, 2010

कविता

वक्त का मरहम 
सावन की तरह
आयी घनघोर घटायें
सदमों की बरसात लिये
तकलीफ?
बहुत तकलीफ हुयी
इस बाढ मे बह गये
दिल मे करीने से संजोये
कुछ सपनों के चिथडे
रखे थी संभाल कर
इस आस मे कि शायद
लगा सकूँ उन पर कुछ पैबन्द
फिर से जी उठी थी
भूल गयी थी कि सावन
तो फिर आयेगा
मगर इस बाढ मे
वो चिथडे भी बह गये
रह गयी बस यादें
ज्येष्ठ आषाढ की धूप मे
सिकुडी मिट्टी की परत जैसी
हाँ तकलीफ हो रही है
हर बार होती है
हर बाढ पर होती है
बहुत तकलीफ
शायद वकत का मरहम
जानता ही इसका ईलाज।

Wednesday, September 1, 2010

कुछ सवाल---2

कुछ सवाल ---- 2

जब से तुम गये हो

हमे लगता है जैसे
आकाश की जगमगाहट
तारों का टिमटिमाना
चाँद का मुस्कुराना
बढ गया है--- शायद
शायद तुम्हारे आसमान मे जाने
का जश्न मना रहे हैं
तभी मन मे
एक और सवाल उठता है
मेरा विश्वास
मेरी आस्था
उस भगवान के प्रति
आहत हो उठती है
सभी धर्म और सन्त लोग कहते हैं
वो दुख हर्ता है पाप हरता है
दयालू है , करुणा निधान है
और भी न जाने कितनी उपमायें देते हैं
अगर वो सच मे करुणा निधान है
तो  एक माँ से उसके बेटे को छीन कर
कौन सी करुणा दिखा रहा है
फिर कुछ जवाब मिलते हैं
:ये पिछले जन्म के करम हैं
और रिश्तों की न सही
मगर क्या वो दयावान, पाप हरता
एक माँ के पिछले जन्म के
पाप नही हर सकता?
धर्म  तो ये भी कहते हैं
कि माँ का दर्जा भगवान से भी बडा होता है।
शायद भगवान की कोई माँ नही होती
उसे दया ममता से कुछ लेना देना नही
या वो केवल अपनी शक्ति दिखाने के लिये
ऐसे खेल खेलता है
आज तुम्हारे जाने से
इन सभी  आस्थाओं पर
एक प्रश्न चिन्ह लग गया है।
और ये सवाल  पर सवाल
तुम्हारी माँ तुम्हारे भाई से
बहुत से सवाल करती है
और वो सब तुम्हारे जवाब की
प्रतीक्षा मे हैं मगर
मुझे पता है--- ये सवाल सदियों
से कई माँयें ,भाई बहन पत्नियाँ करती रही हैं
मैने भी अपने बेटे की मौत पर किये थे।
जब उन्हें जवाब नही मिले
तो फिर इन्हें कैसे मिलेंगे
इनका हल भी हमे खुद ढूँढना पडेगा
जैसे मैने ढूँढ लिया था
ये वक्त का मरहम
बडे बडे घाव भी भर देता है
मगर ये सवाल वक्त बेवक्त
 जीवन भर हमारा पीछा नही छोडते
तुम्हारे जाने से मौत ही नही
ज़िन्दगी भी एक सवाल बन गयी है
लेकिन हम सब मिल कर
इन सवालों का हल ढूँढ लेंगे
इनके साथ जीयेंगे
मगर तुम खुश रहना
बहुत याद आया करोगे
आ कर रुलाया करोगे
मगर फिर भी
तुम्हारी तरह मुस्कुराना हैं हंसना हंसाना है
तुम्हारी तरह जीना है
क्यों कि तुम बहुत अच्छे थे
अपने थे, दिल के करीब
ये मत समझना मेरे सवाल खत्म हो गये हैं
कल फिर आऊँगी कुछ और सवाल ले कर।
तब तक तुम इन चाँद तारों के शहर मे जश्न मनाओ

Monday, August 30, 2010

कुछ सवाल्

कुछ सवाल 
सच मानो-- तुम्हारे जाने से दुखी नही हूँ
दुखी हूँ उस आसमान को देख कर
 जो इस रात के अन्धेरे मे
हम सब को0 आँसू दे कर खुद
जगमगा रहा है
चाँद इतरा रहा है
तारे जैसे मस्ती मे झूम रहे हैं
तुम्हारे उन के पास लौट जाने का जश्न
मगर धरती पर सब ओर सन्नाटा
गहरी उदासी सबकी शब्द भी मूक से हैं
अनुभूतियाँ, अभिव्यक्तियाँ, संवेदनायें
त्रस्त हैं ,कौन किस से क्या कहे?
 कुछ भी नही छोडा तुम्ने कहने को
और मेरा मन कुछ सवालों की
सलीब पर लटक गया है?
सब से पहला सवाल तुम से है
क्या तुम नही जानते थे
कि इन्सान को रोने के लिये भी
एक कन्धा चाहिये होता है
और तुम ने कितनी आसानी से,
या कहूँ कि बेरहमी से
अपना कन्धा खींच लिया
शायद तुम भी आजकल के हिसाब से
प्रैक्टीकल हो गये थे-- यही तो दुख है
 जो दिल से अपने होते हैं
उनका दुख की घडी मे कन्धा खींच लेना
कितना दर्द देता है
दिल की किचरें सम्भाले नही सम्भलती
काश! तुम ये महसूस कर पाते
बाकी सवाल फिर कभी-----


कविता जारी है अगली कडी तक
ये सवाल जब तक हम ज़िन्दा रहेंगे उठेंगे
शायद इतना दर्द उस मसीहे को भी
सलीब पर लटक कर नही हुया होगा
तभी तो वो उपदेश दे कर चले गये
मगर हम तो एक दूसरे को
सान्तवना भी नही दे सकते
फिर भी उसे जी कर दिखाना ही होगा

Sunday, August 29, 2010

एक सांस का फासला

एक साँस का फासला


ज़िन्दगी और मौत

केवल एक साँस का फासला
मगर जन्मों की दूरी

और तुम

कितनी आसानी से

अटक गये उस पर

नहीं बढाया कदम

दूसरी साँस की ओर

शायद तुम्हारा प्रतिशोध था

अपनी ज़िन्दगी से

शायद तुम सही थे

तुम इस फासले के

घोर सन्नाटे का

एहसास करवाना चाहते थे

और जीने वालों के लिये

छोड जाना चाहते थे

कुछ नमूने कि

तुम भी जी कर दिखाओ

मेरी तरह जी कर

देना चाहते थे एक टीस

जो मौत से भी असह है

देखना चाहती हूँ मै भी

इस सन्नाटे का एक एक पल

तुम कैसे जीये थे

उस आखिरी साँस को लेते हुये

हाँ बस इतना ही कर सकती हूँ

हा ! क्या तकदीर है?

कितनी बेबसी है

एक माँ के लिये जीना

बेटे की मौत के बाद

और उसके अँदाज़ मे जीना

हंसते मुस्कुराते जीना

काश! हम ये कर पायें

यही तो सिखाया है तुम ने