Showing posts with label gazal. Show all posts
Showing posts with label gazal. Show all posts

Wednesday, February 23, 2011

गज़ल --gazal

गज़ल
उसकी अर्थी को उठा कर रो दिये थे
रस्म दुनिया की निभा कर रो दिये थे

नाज़ से पाला जिसे माँ बाप ने था
 आग पर उसको लिटा कर रो दियेथे

थी उम्र शहनाइयाँ बजती मगर अब
मौत का मातम मना कर रो दिये थे

दी सलामी आखिरी नम आँखों से जब
दिल के ट्कडे को विदा कर रो दियेथे

यूँ सभी अरमान दिल मे रह गये थे
राख सपनो की उठा कर रो दिये थे

थी बडी चाहत कभी घर आयेगा वो
लाश जब आयी सजा कर रो दिये थे

था चिरागे दिल मगर मजबूर थे सब
अस्थियाँ गंगा बहा कर रो दिये थे

वो सहारा ले गया जब छीन हम से
सिर दिवारों से सटा कर रो दिये थे

रोक लें आँसू मगर रुकते नही अब
दर्द का दरिया बहा कर रो दिये थे

माँ ग ली उसने रिहाई क्यों  खुदा से
कुछ गिले शिकवे सुना कर रो दिये थे